दिल के ज़ज़्बात जब-जब लफ्ज़ बन कागज़ पर बिखरे हैं,
शायरी बन जाते,वो भी तब जब आपको 103 तक बुखार चढ़ा हो?.शायद इसी का नाम ग़ज़ल है नज़्म है…
अर्ज़ है:-
रहे ना रहे चिराग उल्फत के यूँही जलाये रखना.!
बमुश्किल मिलती वफ़ा नग्मों में सजाये रखना.!!
रहे ना रहे चिराग उल्फत के…
कभी शेर बन कभी रुबाई तो कभी ग़ज़लों में.!
साथ गुज़ारे लम्हों को लफ़्ज़ों से बसाये रखना.!!
रहे ना रहे चिराग उल्फत के…
कब मुहब्बत को आसानी से क़बूल करे दुनियां.!
बेवफा ना होना यूँही जहाँ को झुकाये हुए रखना.!!
रहे ना रहे चिराग उल्फत के…
मुहब्बत बाज़ार में नहीं निभा कर कमाई जाती.!
पाक वफ़ा निभा भटकों को राह दिखाए रखना.!!
रहे ना रहे चिराग उल्फत के…
ज़िन्दगी है यहाँ फ़लसफां हो मिट जाने के लिए.!
वक़्त कैसा भी रहे”सागर“सब को हंसाये रखना.!!
रहे ना रहे चिराग उल्फत के…

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Source:: Mehfil101
रहे ना रहे चिराग उल्फत के…”Dedicated”
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