Wednesday, December 06, 2017

ज़हर…

बड़ी बेरहम है जान-ए-जिग्गर,
न खुद मिलती न तस्वीर से प्यार करने देती.!
गर इतना ही करना है सितम,
बाज़ार से बोतल ज़हर की क्यों नहीं ला देती.!!




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ज़हर…

कहीं”सागर”ख्यालों में बसा तो नहीं रखा है.!!

किस खातिर ये दिल सब से संभाल रखा है.!
कहीं”सागर“ख्यालों में बसा तो नहीं रखा है.!!


सब को मिलते हो पर उखड़े-उखड़े होकर.!
क्या राज है दिल में जो सबसे छिपा रखा है.!!


जगती आँखों से भी हसीँ खवाब देखा करो.!
पलकों में गर इस अज़ीज़ को सजा रखा है.!!


पास बैठ कभी दिल-ए-गुबार अपना निकाल.!
दिल किस कम्भखत के नाम धड़का रखा है.!!



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कहीं”सागर”ख्यालों में बसा तो नहीं रखा है.!!