माशा अल्लाहा ये नफ़ासत ये नज़ाकत जवानी के सिवा और कहाँ मिलती है ?
अब आख़िर मिली है तो आदयें भी आयेंगी ही ?
पर क्या ये सही है?
अज़ी छोड़िए ग़ल्त-सही को… जवानी बार-बार थोड़े आती है जो अभी से,
नफे-नुकसान की सौचें ??????
अर्ज़ है :-
जवानी के कुछ दाग ऐसे भी होते,
तह उमर गुज़र जाती फिर भी ना धुलते.!
कहे’सागर‘यारों से फक़त इतना,
उमर पढ़ी है क्यूँ बिन सोचे हो जीते.!!

Jawani Ke Kuch Dag Aise Bhi Hote,
Tah Umar Guzar Jaati Phir Bhi Na Dhulte.!
Kahe ‘Sagar‘ Yaaron Se Faqat Itna,
Umar Padhi Hai Kyun Bin Soche Ho Jeete.!!
Filed under: Shayari Khumar -e- Ishq
Source:: Mehfil101
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