तेरे वादों पे अब यक़ीन करना है छोड़ दिया.!
सनम तेरी गली से निकलना ही छोड़ दिया.!!
कई फूल खिले हैं इस बाग-ए-चमन में माना.!
अब कलियों पर निगाहा करना ही छोड़ दिया.!!
सब को कहाँ मुक्कमिल ज़हान नसीब होता है.!
जो मिला खुश हैं और आस करना छोड़ दिया.!!
आज सौचता गुनहा किया तुझ संग वफ़ा कर.!
वफ़ादारों पे भी अब यक़ीन करना छोड़ दिया.!!
तुझे बेवफा कहूँ और रुसवा कर दूं ज़माने में.!
यार ‘सागर‘ ने तेरा नाम लेना ही छोड़ दिया.!!
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Source:: Mehfil101
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