Tuesday, October 24, 2017

तुझे हक़ है मुझसे बगावत करने का…(Nazam)

तेरे घर से मेरे घर का महज़ फासला इतना.!
तेरे शहर सूरज निकल रहा यहाँ डूब चुका.!!


आप रात-रात भर जाग बतियाते रहे और जब दिल चाहे
कहें”Good Night“…


Is it fair…?


भाई क़त्ल करने की ये आदत तो रास नहीं आई…



तुझे हक़ है मुझसे बगावत करने का,
मैंने कदम-कदम मुहब्बत को रुस्वा जो किया.!
तेरे दर पर आया अक्सर तेरे शहर में,
तेरी गली आ खुदको खुदसे बेशहारा जो किया.!!
तुझे हक़ है मुझसे बगावत करने का…


प्यार में कुछ तो सजा पानी होगी,
जहाँ जख्म न मिले वहां दिल्लगी मुकम्मिल नहीं.!
रोज़ करते वादा साथ निभाने का,
क़र्ज़ तो अब उतारना होगा मुहब्बत का जो लिया.!!
तुझे हक़ है मुझसे बगावत करने का…


तेरी दुनियां से बेहतर और नहीं.
तेरे बगैर गर जीना है तो जहाँ किस काम का मेरे.!
तुझ संग सारे खवाब हकीकत,
तेरे साथ जीने-मरने का वादा खुदा से है जो किया.!!
तुझे हक़ है मुझसे बगावत करने का…



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Source:: Mehfil101


      



तुझे हक़ है मुझसे बगावत करने का…(Nazam)

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