रजाई में वो जब गुस्स जाती है,
ठण्ड में कमबख्त को नींद बड़ी आती है.!
तकिये को बाँहों में भींचती है,
ज़ालिम अपने करीब क्यों नहीं बुलाती है.!!..
सुबह उठ संदेसा छोड़ जाती है,
रातों को तरसा-तरसा बेमुर्रब्ब इतराती है.!
डाल दुप्पटा सीने पर मुस्काती है,
जलती चिंगारी को और हवा दे जाती है.!!…
हुस्न बेमिसाल तभी इठलाती है,
आईने में खुदको देख आईने को चिढ़ाती है.!
न-न कर हया की मूरत बनती है,
सखियों में जा शायरी”सागर“की सुनाती है.!!…
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Source:: Mehfil101
सखियों को शायरी”सागर”की सुनाती है.!!
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