एक दोस्त है जिसे एक शहर की लड़की से प्यार हो गया है,
उसे ना उसका पता मालूम है और ना ही उसका फैसला…?
बेचारा शहर की गलियों में ढूंढते-ढूंढते एक्सीडेंट करा बैठा,
एक हाथ और टांग तुड़ा बैठा…
कभी उसपर तरस भी आता है और कभी गुस्सा भी…
पर वो भी क्या करे बेचारा”आखिर दिल दा मामला होता ही ऐसा है“
अर्ज़ किया है:-
ना पता मालूम ना गली,
खबर है सिर्फ नाम शहर की.!
कैसी होती है मुहब्बत,
तड़पे फिर भी सर चढ़ बोले.!!
सिर्फ एक तस्वीर सहारे,
पहाड़ पर चढ़ने है चलेगी.!
वाह रे आशिक क्या खूब,
ज़िन्दगी बड़ी खूब कटेगी.!!
पीली-सफ़ेद तस्वीर से,
उसे कैसे पहचान सकेगा.!
फिरोजाबादी लड़कियों में,
मुहब्बत को तलाश सकेगा.!!
कुंवारी या शादी-शुदा,
पेच यहाँ भी है फंसा हुआ.!
यार तूं बड़ा बावला है,
परछाई पीछे क्यों पड़ा हुआ.!!
मुश्किल से चाहत मिलती,
किसी की पाक वफ़ा मिलती.!
क़बूल तो तस्वीर बदल दे,
प्रोफ़ाइल पिक सिगनल होती.!!
यूँ अता-पता ना दोगी,
सोचो वफ़ा परवान कैसे चढ़ेगी.!
जब तक खामोश रहोगी,
“सागर“की शायरी ना पड़ोगी.!!
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Source:: Mehfil101
खामोश रहोगी तो”सागर”की शायरी ना पड़ोगी.!!
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