तेज़ बारिश हो और जनाब भीग जायें सर से पाँव तक?
यक़ीनन पानी में भी आग लग जाएगी फिर बंदे की बिसात कहाँ?
ग़ज़ल अर्ज़ है:-
अफ ये कम्बख़त बारिश और उस पर आपका हुस्न.!
मदहोश कर रहा बिन पिए आप का बेमिसाल हुस्न.!!
करीने से सजाया-संवारा मालिक ने फ़ुर्सत में शायद.!
कर गया होगा उसे भी गुमरहा आपका हसीन हुस्न.!!
बारिश का मज़ा और भी बढ़ जाता जो भिगो आप.!
छेड़े भीगा बदन आपका और उस पर नशीला हुस्न.!!
बाग-ए-चमन में कलियाँ कई खिलखिलाते फूल भी.!
भंवरे भटक मचल रहे हैं देखा ना पहले ऐसा हुस्न.!!
तसव्वुर में बसे हो आज कल आप ज़िंदगी बन कर.!
दुआ ‘सागर‘ की रात-दिन हो अपना आपका हुस्न.!!

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Source:: Mehfil101
Incomparable Beauties. !!
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