ज़िंदगी भी इंसान को क्या-क्या रंग दिखती है
आज जो अज़ीज़ है दिल के बहुत करीब एक
पल में ही बेगाना हो जाए तो जीना दुश्वार हो जाता है!पर बेवफा तो बेवफा ही रहेगा ना?
दर्द और तन्हाई का मज़ा लेगा?दूजे के सामने खुदको पाक-सॉफ दिखलाएगा?शायद उसकी नज़र में यही मुहब्बत है??
ये ग़ज़ल इक ऐसे जान-ए-जिंगर के लिए लिखी है
जिसे आज तक ना बेवफा समझा जा सका और ना ही वफ़ादार?इसे बदक़िस्मती ही कहा जा सकता है??
ग़ज़ल अर्ज़ है:-
उसकी बाहों में सिमट मुझको कैसे भुलाती होगी.!
आईने में देख माँग में सिंधुर कैसे सजाती होगी.!!
कई बार भरा था इस ग़रीब के नाम से भी जो.!
उस सिंधुर की लाज़ कैसे सब से बचाती होगी.!!
ना यहाँ की और ना ही वहाँ की वफ़ा जानती है.!
रब्ब आगे खुदको कैसे पाक-साफ बताती होगी.!!
बेचैन रूह है परेशान ज़िज्गर उधर ज़रूर होगा.!
तन्हाई में याद कर कभी तो आँसू बहाती होगी.!!
नाज़ था’सागर‘को तुझ पर और तेरी वफ़ा पर.!
तेरे आँगन मुहब्बत शर्म से सर झुकाती होगी.!!
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Source:: Mehfil101
सनम हरजाई.!!
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