एक वक़्त था जब मुहब्बत पर बड़ा यक़ीन होता था पर आज महज़
धोखा-फरेब नज़र आता है जाने क्यूँ?
सब बेकार की बातें लगती हैं?उनका आना उनका जाना,सपनें वादे
सब पर से यक़ीन उठ गया है जाने क्यूँ?
जब दर्द दिल का बढ़ जाता है क़लम उठ कर लफ्ज़ बन काग़ज़ पर
बिखर जाते हैं!
अर्ज़ है:-
किताबों में जो लिखी है मुहब्बत हरदम वैसी नहीं होती.!
सच है यारो मुहब्बत कभी इतनी भी खूबसूरत नहीं होती.!!
कदम-दर-कदम मिलते बंधन नफ़रत ज़ुल्म-ओ-सितम.!
धड़कते दिलों की मंज़िल आसान राहों से हो नहीं गुज़रती.!!
प्यार लैला ने किया मजनू ने शीरी-फरहाद हमनें-तुमनें.!
पर आज मुहब्बत में पहले-सी वफ़ा-शराफ़त नहीं होती.!!-
मंज़िल की तलाश में परिंदे फल्क पर यहाँ-वहाँ भटकते.!
हर पंछी को कभी भी यहाँ मनचाही परवाज़ नहीं मिलती.!!
इक महज़बीन हसीना से कभी प्यार किया था’सागर‘ने.!
सपनों में तो मिलती हक़ीक़त में कभी रूबरू नहीं होती.!!

Filed under:
Source:: Mehfil101
Shatter Dreams …
No comments :
Post a Comment