कभी-कभी दिल में वो अनचाहे लम्हें याद हो आते हैं जिन्हें हम याद ही नहीं करना चाहते,
पर क्या करें कम्बख़त दिल ही तो है जाने कब-क्या सौच बैठे? ऐसी ही एक याद लफ्ज़ बन,
कागज पर बिखर आई है !
अर्ज़ है:-
कभी गैरों ने कभी अपनों ने लूटा,
हमें ज़िंदगी ने पग-पग पे लूटा.!
शिक़वा-शिक़ायत नहीं ‘सागर‘,
गम है अपना क्यूँ बन-बन लूटा.!!

Kabhi Gairo Ne Kabhi Apno Ne Luta,
Humein Zindagi Ne Pag-Pag Pe Luta.!
Shiqawa – Shiqaayat Nahin ‘Sagar‘,
Gum Hai Apna Kyun Ban – Ban Luta.!!
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Source:: Mehfil101
But Why…
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