Wednesday, July 13, 2016

ज़िंदगी की कमी है तू…


इस रूमानी रात में यादों के झरोखों से एक ग़ज़ल बन पड़ी!

कुछ साल पहले इस का पहला भाग लिखा था जो यहीं पीछे

की पोस्ट में लिखी है,

आज अगला भाग लिखने की कोशिश की है,
“कब-कुछ गुज़रा याद आ जाए ये इंसान के अपने बस में नहीं“

अर्ज़ है:-


मेरी ज़िंदगी की कमी है तू,
जिसे चाहा कर ना भुला सकूँ.!


जो हवा मुझे दर्द दे गयी,
वो तेरे गमों को ले उड़े.!!


मेरा वक़्त तो गुज़र गया,
तेरे सामने है अभी ज़िंदगी पड़ी.!


तू अभी-अभी जवान हुई,
मेरी ज़िंदगी की शाम ढाल चुकी.!!



एक दिल ही है सीने में,
बता और को मैं क्या दे सकूँ.!


चाहा तुझे बेशुमार मैने,
किसी और से ना वफ़ा कर सकूँ.!!



तेरी ख्वाहिश ना रहे अधूरी,
है खुदा से दुआ दिन-रात यही.!


तेरी चाहत तुझे नसीब हो,
है रब्ब से भी हरदास यही.!!


kami.jpg


Meri Zindagi Ki Kami Hai Tu,


Jise Chaha Kar Na Bhula Sakun.!


Jo Hawa Mujhe Dard De Gayi,


Wo Tere Gumon Ko Le Ude.!!



Mera Waqt To Guzar Gaya,


Tere Samne Hai Abhi Zindagi Padi.!


Tu Abhi-Abhi Jawan Huyi,


Meri Zindagi Ki Shaam Dhal Chuki.!!



Ek Dil Hi Hai Seene Mein,


Bata Aur Ko Main Kya De Sakun.!


Chaha Tujhe Beshumar Maine,


Kisi Aur Se Na Wafa Kar Sakun.!!



Teri Khwahish Na Rahe Adhuri,


Hai Khuda Se Dua Din-Raat Yahi.!


Teri Chahat Tujhe Naseeb Ho,


Hai Rabb Se Bhi Hardaas Yahi.!!


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Source:: Mehfil101


      



ज़िंदगी की कमी है तू…

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