Mehfil101
बेसहारा-सा जब से तू दूर हुई दिखता
तेरी सूरत मेरी आँखो से नहीं निकल पाती है…!
जैसे धड़कन दिल से जुदा नहीं हो पाती है…!!
तुझे चाह हूं तह उमर हसरत बस यही है…!
ज़िंदगी तो फिर भी जैसे-तैसे कर गुज़र जाती है…!!
एक अधूरी खाविश जिगर मे अब भी बाकी है…!
तेरे कदमो मे जान क्यूँ नहीं निकल जाती है…!!
कब तल्क आँख बंद कर तुझे देखूँगा मैं…!
क्यूँ नहीं आ कर अपनी ज़लक दिखा जाती है…!!
बेसहारा-सा जब से तू दूर हुई दिखता ‘सागर’ …!
क्यूँ नहीं आ जिस्म से जान जुदा किए जाती है…!!
ज़िंदगी तो फिर भी जैसे-तैसे कर गुज़र जाती है…!!
तेरे कदमो मे जान क्यूँ नहीं निकल जाती है…!!
क्यूँ नहीं आ कर अपनी ज़लक दिखा जाती है…!!
क्यूँ नहीं आ जिस्म से जान जुदा किए जाती है…!!
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